राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने पाकिस्तान के साथ संवाद के रास्ते खुले रखने की जरूरत संबंधी वरिष्ठ संघ नेता दत्तात्रेय होसबाले के बयान का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि होसबाले का जोर पाकिस्तान की नीतियों का समर्थन करने पर नहीं, बल्कि वहां के लोगों के साथ संपर्क बनाए रखने पर था।
तिरुवनंतपुरम में आरएसएस के शताब्दी समारोह के तहत आयोजित एक संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि संघ की अपनी कोई अलग विदेश नीति नहीं है। पाकिस्तान के संबंध में संगठन केंद्र सरकार की ओर से अपनाई गई नीति का पूरी तरह पालन करता है।
मई में दिए गए एक साक्षात्कार में होसबाले की टिप्पणियों को लेकर पूछे गए सवालों के जवाब में भागवत ने कहा कि दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद पाकिस्तान में ऐसे कई लोग हैं, जो विभाजन के पीछे की विचारधारा को स्वीकार नहीं करते।
भागवत ने कहा, ‘‘पाकिस्तान में बहुत से लोग मानते हैं कि भारत का विभाजन गलत था। ऐसे लोगों की एक अंतर्धारा मौजूद है, जो द्विराष्ट्र सिद्धांत का विरोध करती है और मानती है कि साथ रहना बेहतर विकल्प था।’’
RSS प्रमुख ने कहा कि यदि कभी ऐसी परिस्थितियां बनती हैं, जिनमें पाकिस्तान पूरी तरह पराजित हो जाए, तो वहां के लोगों को या तो भारत में शामिल करना होगा या उन्हें अपने देश में शांतिपूर्वक रहने देना होगा।
उन्होंने कहा, ‘‘हम हिटलर जैसे नहीं हैं। यह न तो हमारा स्वभाव है और न ही हमारा तरीका। अन्याय और अत्याचार को समाप्त किया जाना चाहिए, लेकिन जो कुछ अच्छा है, उसे बचाए रखना भी जरूरी है।’’
भागवत ने दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय मामलों पर RSS का रुख भारत सरकार की नीति के अनुरूप है और संगठन अपनी अलग कूटनीतिक या विदेश नीति तैयार नहीं करता।
आरएसएस का दावा है कि यह एक "हिंदू केंद्रित सभ्यतागत, सांस्कृतिक आंदोलन" है जिसका लक्ष्य हिंदुओं को एकजुट करके और धर्म की रक्षा करके "राष्ट्र को गौरव के शिखर तक ले जाना" है।
1925 में अपनी स्थापना के बाद से इस पर कई बार प्रतिबंध लग चुका है, जिसमें 1948 में इसके एक सदस्य नाथूराम गोडसे द्वारा स्वतंत्रता नायक गांधी की हत्या के बाद का प्रतिबंध भी शामिल है।






















