अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना के विरोध में प्रदर्शन हिंसक हो गया। शुक्रवार देर रात प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, जिसमें लगभग 40 पुलिसकर्मी घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस थाने, सरकारी संपत्तियों और सरकारी जलविद्युत कंपनी एनएचपीसी के कार्यालय में तोड़फोड़ करने तथा इमारतों में आग लगाने का आरोप है।
राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने शनिवार को पत्रकारों को बताया कि प्रदर्शन के दौरान कई संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया।
उन्होंने कहा, “भीड़ ने बड़ी संख्या में संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। पुलिस स्टेशन और एनएचपीसी कार्यालय में तोड़फोड़ की गई तथा कई निर्वाचित प्रतिनिधियों के घरों में भी उत्पात मचाया गया।”
अधिकारियों के अनुसार, बांध परियोजना का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया, जिससे लगभग 40 पुलिसकर्मी घायल हो गए।
प्रदर्शनकारियों ने एनएचपीसी के कार्यालय में भी तोड़फोड़ की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।
मुख्यमंत्री खांडू ने प्रदर्शनकारियों से हिंसा छोड़कर सरकार के साथ बातचीत करने की अपील की।
उन्होंने कहा, “हमसे सवाल पूछिए, हमारे साथ बातचीत कीजिए, हिंसा का रास्ता मत अपनाइए।”
चीन के विशाल बांध का मुकाबला करने के लिए प्रस्तावित है परियोजना
भारत सरकार के अनुसार, सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना का उद्देश्य चीन द्वारा तिब्बत में बनाए जा रहे विशाल याक्सिया जलविद्युत परियोजना के संभावित प्रभावों का मुकाबला करना है।
चीन की इस परियोजना की अनुमानित लागत 167 अरब डॉलर है और इसे दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है।
भारत को आशंका है कि चीन की परियोजना के कारण निचले इलाकों में नदी के जल प्रवाह पर असर पड़ सकता है।
नई दिल्ली का कहना है कि प्रस्तावित भारतीय बांध से एक विशाल जलाशय तैयार होगा, जो पानी का भंडारण करके ब्रह्मपुत्र नदी में जल प्रवाह बनाए रखने में मदद करेगा।
हालांकि, चीन का दावा है कि उसकी परियोजना से नदी के निचले क्षेत्रों में कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना भारत की अब तक की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना होगी।
लेकिन अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय समुदाय इसका विरोध कर रहे हैं।
प्रभावित क्षेत्रों के निवासियों को आशंका है कि बांध और विशाल जलाशय के निर्माण से उनकी जमीन और घर डूब सकते हैं तथा उन्हें विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।
परियोजना के संभावित सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध बढ़ रहा है।
एक ओर केंद्र सरकार इसे जल सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों से जोड़ रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदाय अपने घरों, जमीन और आजीविका को लेकर चिंता जता रहे हैं।






















