अयोध्या के राम मंदिर में दान की कथित हेराफेरी की जांच ने देश के बड़े धार्मिक स्थलों में आने वाली भारी नकदी, सोना और अन्य चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुलिस ने जून में इस मामले की जांच शुरू की थी और मंदिर में दान संभालने से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया। अधिकारियों ने अभी तक कथित तौर पर चोरी की गई राशि का खुलासा नहीं किया है, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह रकम करीब 3 करोड़ रुपये तक हो सकती है।
उन्होंने कहा, “जब हम दान देते हैं, तो हमें भरोसा होता है कि यह पैसा भगवान के काम में लगेगा। अगर मेहनत की कमाई मंदिर जैसी जगह से चोरी हो जाए, तो यह निजी नुकसान जैसा लगता है।”
यह मामला बड़े तीर्थस्थलों में दान से जुड़े विवादों की ताजा कड़ी है। इससे पहले बद्रीनाथ मंदिर और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम जैसे प्रमुख धार्मिक संस्थानों में भी दान प्रबंधन को लेकर सवाल उठ चुके हैं। तिरुपति मंदिर ट्रस्ट दुनिया के सबसे धनी मंदिर ट्रस्टों में गिना जाता है, जिसकी संपत्ति अरबों डॉलर में आंकी जाती है।
धार्मिक संस्थानों में बड़ी मात्रा में धन और संपत्ति आने के कारण पारदर्शिता और जवाबदेही एक बड़ी चुनौती
रिपोर्टों के अनुसार, राम मंदिर मामले में आरोपियों ने कथित तौर पर कमजोर गिनती प्रक्रिया और निगरानी में खामियों का फायदा उठाया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 में राम मंदिर का उद्घाटन किया था। इसके बाद यह देश के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया है, जहां रोजाना औसतन करीब 90,000 श्रद्धालु पहुंचते हैं।
श्रद्धालु मंदिर में नकद राशि, सोना, चांदी के आभूषण और अन्य चढ़ावे अर्पित करते हैं, जिससे नियमित रूप से बड़ी मात्रा में दान आता है।
इन आरोपों की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि राम मंदिर उस स्थल पर बना है, जो दशकों तक भारत के सबसे लंबे और विवादित धार्मिक विवादों में से एक का केंद्र रहा।
1992 में भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देशभर में हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें 2,000 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।




















