लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC के पास बसे गांवों के निवासियों ने संसदीय पैनल के सामने दावा किया है कि 2020 में चीन के साथ सीमा तनाव के बाद उन्हें अपने पारंपरिक चरागाहों तक पहुंच नहीं मिल पा रही है।
लद्दाख दौरे पर गई पर्यटन, परिवहन और संस्कृति पर संसदीय स्थायी समिति से मुलाकात के दौरान सीमावर्ती गांवों के प्रतिनिधियों ने यह मुद्दा उठाया।
मांग पांगोंग A और B, लेह और लद्दाख के सीमावर्ती गांवों का प्रतिनिधित्व कर रहे 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि स्थानीय घुमंतू पशुपालकों को सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय से भारत की पारंपरिक चराई भूमि तक नियंत्रित पहुंच दी जानी चाहिए।
चुशुल के पूर्व पार्षद कोंचोक स्टैनजिन के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल ने समिति से कहा कि सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय समुदायों की निरंतर मौजूदगी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
ग्रामीणों का कहना है कि इन क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से पशुपालन और चराई उनकी आजीविका का मुख्य आधार रहा है। चरागाहों तक पहुंच सीमित होने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है, बल्कि सीमावर्ती गांवों में आबादी बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
प्रतिनिधिमंडल ने पैनल को बताया कि स्थानीय लोगों की मौजूदगी frontier regions में भारत की नागरिक उपस्थिति को मजबूत करती है और सीमा सुरक्षा के लिहाज से भी इसका महत्व है।
2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव के बाद कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी। इसके बाद स्थानीय समुदायों ने कई बार पारंपरिक चराई मार्गों और जमीनों तक पहुंच सीमित होने की शिकायत की है।

















