यूक्रेन और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के कारण रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं में आई बाधाओं के बाद भारतीय वायुसेना ने दर्जनों महत्वपूर्ण पुर्जों की पहचान की है, जिन्हें वह घरेलू निर्माताओं से तैयार कराना चाहती है।
भारतीय वायुसेना द्वारा गुरुवार को नई दिल्ली में उद्योग जगत के लिए जारी एक दस्तावेज के अनुसार, इन संघर्षों ने “आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, महत्वपूर्ण स्पेयर पार्ट्स की कमी और लागत में भारी वृद्धि” पैदा की है।
यह पहल सैन्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है। बैठक में वरिष्ठ अधिकारी और प्रमुख रक्षा निर्माता शामिल हुए, जहां वायुसेना ने उन पुर्जों और प्रणालियों की रूपरेखा रखी जिन्हें स्थानीय स्तर पर विकसित और उत्पादित करने की जरूरत है।
दस्तावेज के अनुसार, सबसे बड़ी चुनौतियों में GPS-सक्षम एंटेना विकसित करना शामिल है। इनका इस्तेमाल सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की स्थिति और दिशा निर्धारित करने में किया जाता है। वायुसेना ने कहा कि इजराइल इनकी “मरम्मत या खरीद सेवा” उपलब्ध कराने में असमर्थ है।
वायुसेना ने कंपनियों से रूसी मूल के हेलीकॉप्टरों के टेल रोटर में इस्तेमाल होने वाली चेन जैसे पुर्जों के निर्माण पर भी ध्यान देने को कहा है। रूसी मूल के हेलीकॉप्टर भारतीय वायुसेना के बेड़े का बड़ा हिस्सा हैं।
इसके अलावा, मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के स्पेयर पार्ट्स को भी स्वदेशी स्तर पर तैयार करने की जरूरत बताई गई है।
सूची में पश्चिमी मूल के विमानों में इस्तेमाल होने वाले रबर सील, गैस्केट और ग्लैंड जैसे घटक भी शामिल हैं। दस्तावेज के अनुसार, वायुसेना ने रूसी मूल के जेट और हेलीकॉप्टरों में इस्तेमाल होने वाले रबर पुर्जों के घरेलू विकल्प विकसित कर लिए हैं, लेकिन पश्चिमी मूल के विमानों के लिए अभी ऐसे स्वदेशी विकल्प उपलब्ध नहीं हैं।
वायुसेना का जोर है कि घरेलू रक्षा उद्योग केवल बड़े प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि छोटे लेकिन महत्वपूर्ण पुर्जों और स्पेयर पार्ट्स के उत्पादन में भी सक्षम बने।























