भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर 1996 में हुआ 30 वर्षीय समझौता 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में नया समझौता नहीं होने की आशंका ने बांग्लादेश में जल संकट को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
AFP की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश को डर है कि यदि समय रहते नया समझौता नहीं हुआ तो देश में पानी की कमी और गंभीर हो सकती है। इससे कृषि, मत्स्य पालन और नदी पर निर्भर करोड़ों लोगों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका है।
विश्व बैंक के अनुसार, 2,525 किलोमीटर लंबी गंगा नदी दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले नदी बेसिन से होकर गुजरती है, जहां लगभग 65.5 करोड़ लोग रहते हैं। इनमें बांग्लादेश के पांच करोड़ से अधिक लोग शामिल हैं।
बांग्लादेश के सूखाग्रस्त बारिंद क्षेत्र में रहने वाले 72 वर्षीय बिकाश सोरेन को वह समय याद है जब भारत से आने वाली गंगा नदी में पूरे वर्ष बड़ी नावें चलती थीं।
बांग्लादेश में गंगा को पद्मा के नाम से जाना जाता है। नदी में मछलियों की संख्या और पकड़ घटने के कारण कई मछुआरे पारंपरिक पेशा छोड़ने को मजबूर हुए हैं।
55 वर्षीय अबू बकर सिद्दीक ने बताया कि पहले वह नदी से कई तरह की मछलियां पकड़ते थे, लेकिन अब तालाबों में मछली पालन करने लगे हैं।
उन्होंने कहा, “अब हमें मछलियां कहां मिलेंगी? पहले मैं कई तरह की मछलियां पकड़ता था।”
12 दिसंबर को समाप्त होगा 1996 का समझौता
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारा समझौते पर 1996 में हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता शुष्क मौसम के दौरान भारत के फरक्का बैराज से गंगा के पानी के बंटवारे को नियंत्रित करता है। फरक्का बैराज बांग्लादेश की सीमा से लगभग 20 किलोमीटर पहले भारतीय क्षेत्र में स्थित है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के सलाहकार और जल बंटवारे संबंधी तकनीकी समिति के प्रमुख राशेद अल महमूद तितुमीर ने AFP से कहा कि ढाका पारस्परिक लाभ और सम्मान के आधार पर नया समझौता चाहता है।




















