अमेरिका और ईरान के बीच सप्ताहांत में हुई उच्चस्तरीय वार्ता ने भले ही कोई ठोस समझौता नहीं दिया, लेकिन इसने एक संभावित कूटनीतिक प्रक्रिया की “नींव” जरूर रखी है। पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रेज़ा अमीरी मोग़द्दम ने रविवार को यह बात कही।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बयान जारी करते हुए कहा, “इस्लामाबाद वार्ता कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है, जो आपसी विश्वास और इच्छाशक्ति के मजबूत होने पर सभी पक्षों के हितों के लिए स्थायी ढांचा तैयार कर सकती है।”
यह वार्ता ऐसे समय हुई जब पाकिस्तान ने 8 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिन का युद्धविराम कराने में अहम भूमिका निभाई। इससे 28 फरवरी से जारी तनाव और संघर्ष पर अस्थायी विराम लगा, जिसकी शुरुआत अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हवाई हमलों से हुई थी।
पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित इस बैठक में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर क़ालिबाफ़ शामिल हुए। यह 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सबसे उच्च स्तर की सीधी बातचीत मानी जा रही है।
लंबी चली वार्ता के बावजूद दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके। अमेरिकी पक्ष ने ईरान के सामने कई “रेड लाइन” रखीं, जिनमें यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना, प्रमुख परमाणु सुविधाओं को खत्म करना, संवर्धित यूरेनियम वापस करना, क्षेत्रीय समूहों को समर्थन बंद करना और होरमुज जलडमरूमध्य को खोलना शामिल था।
वहीं ईरान ने इन मांगों पर तुरंत सहमति देने के बजाय पहले भरोसे और सुरक्षा गारंटी की जरूरत पर जोर दिया।













